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जमगाई में छोटानागपुर के प्रेरित फ़ाo कॉन्स्टेंट लीवन्स की स्मृति में तीर्थयात्रा सफ़लता पूर्वक संपन्न 

रविवार, मार्च 22, 2026, जमगाई, राँची:  राँची काथलिक महाधर्मप्रांत के हुलहुंडू पल्ली क्षेत्र में स्थित जमगाई में फ़ाo कॉन्स्टेंट लीवन्स की स्मृति में आज तीर्थयात्रा का आयोजन रहा जिसमें हजारों की संख्या में ख्रीस्त विश्वासी शामिल रहे। राँची काथलिक महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आईंद आज के मिस्सा बलिदान के मुख्य अनुष्ठाता रहे। साथ ही आज के मुख्य उपदेशक हजारीबाग के धर्माध्यक्ष आनंद जोजो भी उपस्थित रहे । 

प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी जमगाई में फ़ाo कॉन्स्टेंट लीवन्स की स्मृति में तीर्थयात्रा का आयोजन रहा। विश्वासियों का आगमन प्रातः 7 बजे से ही होता रहा। फिर एक साथ मिलकर सभी रोजरी माला विनती करते हुए तीर्थ स्थल पर इकट्ठे हुए। उड़ीसा से आए पुरोहित ने सभी को आध्यात्मिक निर्देश देते हुए पापस्वीकर संस्कार के लिए तैयार किया। सभी ने पापस्वीकर संस्कार ग्रहण कर अपने जीवन में सकारत्मक परिवर्तन लाने का प्रण लिया। तत्पश्चात पवित्र मिस्सा बलिदान आरंभ हुआ। प्रवेश गान एवं नाच के साथ मुख्य अनुष्ठाता एवं अन्य पुरोहितगण वेदी पर आए। फ़ाo विंसेंट मिंज ने सभी का स्वागत किया। महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आईंद ने स्मारक पर माल्यार्पण किया एवं बिशप आनंद जोजो और फ़ाo अजित कुमार खेस ने मशाल जलाया। जल की आशीष एवं पवित्र जल छिड़कने के बाद मिस्सा बलिदान आरंभ किया गया। बिशप आनंद जोजो ने अपने धर्मोपदेश में मिशनरियों के योगदान की सराहना करते हुए कहा, "समाज एवं देश के विकास में उनका योगदान अतुल्य है उनके न होने पर हम आदिवासियों का जीवन कठिनाइयों एवं अंधेरे में गुजरता।" उन्होंने फ़ाo कॉन्स्टेंट लीवन्स एवं अन्य मिशनरियों का हवाला भी प्रस्तुत भी किया। साथ ही हमें भी मिशनरी बनने का आह्वान किया। यह रांची कैथोलिक महाधर्मप्रांत एवं आसपास के विश्वासियों के लिए लाभदायक तीर्थयात्रा रहा क्योंकि उन्होंने इसके द्वारा अपने विश्वास को मजबूत किया। साथ ही सभी ने मिलकर फ़ाo कॉन्स्टेंट लीवन्स के संत बनने के लिए भी पिता ईश्वर से प्रार्थना किया गया। 

 इस अवसर पर में राँची काथलिक महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आईंद के अलावा, हजारीबाग के धर्माध्यक्ष आनंद जोजो, राँची येसु धर्म संघ के प्रोविंशियल फ़ाo अजित कुमार खेस, फ़ाo आनंद डेविड खलखो, फाo विंसेंट मिंज, फ़ाo जॉर्ज टोप्पो, फ़ाo फिलमोन लकड़ा, विभिन्न पल्लियों के 50 से अधिक पुरोहित, धर्मबहनें एवं हजारों की संख्या में ख्रीस्त विश्वासी शामिल रहे। 

छोटानागपुर के प्रेरित
ईश-सेवक फा. कोन्सटन्ट लीवन्स की संक्षिप्त जीवनी
(1856-1893)

यूरोप महादेश के बेल्जियम में पश्चिमी पलैंडर्स प्रदेश में मोर्सलेड नामक एक गाँव है। इसी गाँव में जोन लीवन्स और बारबारा डेपुयित नामक एक धर्मी दम्पति रहते थे। यह एक साधारण परिवार था और खेती-बारी द्वारा उनकी जीविका चलती थी। उसी परिवार में सातवीं संतान के रूप में फादर कोन्सटन्ट लीवन्स का जन्म 11 अप्रैल 1856 ई. में हुआ। बाद में इस परिवार में और चार संतान हुए। इस तरह माता-पिता, पाँच पुत्र और छः पुत्रियों से मिलकर 11 सदस्यों का एक बड़ा परिवार बना। इनका परिवार गाँव के अन्य परिवारों के लिए आदर्श था क्योंकि वे बड़ा परिवार होने पर भी बड़े मेल-प्रेम से एक दूसरे की परवाह करते हुए श्रद्धा एवं प्रेम से रहते थे। इनके परिवार में रोज दिन शाम के समय एक-साथ पारिवारिक प्रार्थना होती थी। इसी का फल रहा कि आगे चलकर ईश-सेवक फादर कोन्सटन्ट लीवन्स, महान मिशनरी छोटानागपुर के प्रेरित कहलाए। जब फादर कोन्सटन्ट लीवन्स सात साल के थे उस समय पल्ली के निकट सिस्टरों के विद्यालय से उनकी प्रारंभिक पढ़ाई शुरू हुई। 11 साल की उम्र में अच्छी तैयारी करके इन्होंने पहला परमप्रसाद ग्रहण किया। इसी वर्ष उनकी माँ की तबीयत बिगड़ी और उनका देहांत हो गया। उसकी माँ उसके लिए पूरी दुनिया थी इसलिए उसकी मृत्यु लीवन्स को पूरी तरह से झकझोर दिया। वह माता के वियोग में विद्यालय जाना बन्द कर दिया। वह घर में रहकर घर और खेतों के कामों में मदद करने लगा। पशुओं को चराना, उन्हें दाना पानी देना और गोशालों को साफ-सफाई करना उनकी निदचर्या बन गई। हर काम वह खुशी से करता था। कोई भी काम उसे बोझ या भारी नहीं लगता था। खुले खेतों में काम करने और पेड़ों की छाया में मवेशियों की देख-रेख करते हुए उन्हें प्रकृति से अद्भुत लगाव हो गया था। इसी कारण अकेले रहने पर भी उन्हें अकेलापन का एहसास नहीं होता था। अवसर मिलने पर वह अपने हम उम्र के बच्चों को उदारतापूर्वक धर्म की शिक्षा दिया करता था। कभी-कभी उन्हें घोड़ों की देखभाल करने का मौका मिला। इसका लाभ लेते हुए वह घुड़सवारी सीखने का प्रयास भी करता था। इसी तरह दो तीन साल बीत गये। ईश्वर की योजना विचित्र होती है। उनकी पल्ली में अम्पे नामक एक नया पल्ली पुरोहित का आगमन हुआ और वहाँ के हर विश्वासी को अपने प्रवचनों से बहुत प्रभावित किया। उन्होंने नवयुवकों को पुरोहित बनने के लिए चुनौती दी। उनके प्रवचन से प्रभावित होकर फादर कोन्सटन्ट लीवन्स के मन में पुरोहित बनने की लालसा जगी। जब यह बात उनके पल्ली के अन्य पुरोहितों तक आयी तो वे बहुत खुश हुए और उन्होंने पढ़ाई फिर से जारी करने की सलाह दी। इतना ही नहीं उनकी पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद की व्यवस्था भी कर दी। इस तरह तीन साल बाद फिर से वह अपनी पढ़ाई शुरू किया। प्रारंभ में उन्हें बहुत दिक्कत हुई, पर पुरोहित बनने की ललक, उनको लगातार लगे रहने के लिए प्रेरित करता रहा। साथ ही वह खूब प्रार्थना करता था। धीरे-धीरे उनकी पढ़ाई-लिखाई में सुधार हुई और कुछ वर्षों के अंतराल वह अपने को इस काबिल कर लिया कि उन्हें कई पुरस्कार भी मिले। वह सेमेनरी गया जहाँ उन्होंने अपनी पुरोहित बनने की पढ़ाई प्रारंभ की। वह एक मिशनरी बनना चाहता था।
उन्होंने पाया कि धर्मप्रांतीय बनने से मिशनरी बनने की संभावना बहुत कम थी। अतः मिशनरी बनने के लिए धर्मप्रांतीय परोहित की पढाई छोडकर, येस संधी धर्मसमाज में भर्ती हुआ और पूरी उत्सुकता और समर्पित होकर दो साल के नोभिशियेट की पढ़ाई आसानी से खत्म की। लीवन्स ने प्रार्थना और अच्छे आचरण से अधिकारियों का दिल जीता और यह प्रमाणित किया कि वह मिशनरी बनने का दम रखता है। इस तरह प्रथम मन्नत लेने से पहले ही उनकी काबिलयत और मिशनरी बनने की भावना और उत्साह के कारण, उन्हें भारत के बंगाल मिशन के लिए चुन लिया गया। अतः मन्नत लेने के पश्चात् दूसरे ही दिन उसे भारत देश भेज दिया गया। वह पाँच सप्ताह की लम्बी यात्रा तय कर 2 दिसम्बर 1880 को वह कलकत्ता पहुँचा। एक महीने के बाद वे आसनसोल गये और वहाँ से अपने ईश शास्त्र की पढ़ाई जारी रखी। वहीं उन्होंने हिन्दी सहित कई अन्य भाषाओं का भी अध्ययन किया। 14 जनवरी 1883 को कलकत्ता के आर्चबिशप पी. गुथौल्स ये.स. के कर कमलों से उसे पुरोहित अभिषेक दिया गया और जब तक ईश-शास्त्र की पढ़ाई, पूरी नहीं हुई तब तक वह कलकत्ता के संत जेवियर कॉलेज में देश दुनिया के तौर-तरीकों का अनुभव करते हुए अपनी सेवाएँ दीं। बाद में उन्हें छोटानागपुर मिशन पर भेजा गया और यहीं से उनकी असली प्रेरिताई कार्य शुरू हुई।

वे 8 मार्च 1885, को गिरीडीह होते हुए डोरंडा आये और अगले ही दिन अर्थात् 19 मार्च को वे जमगाई पहुँचे और आठ महीने वे यहाँ रहे। इस दरम्यान उन्होंने अलग-अलग जगहों का भ्रमण किया और लोगों से भेंट-मुलाकात की। वे लोगों की भाषा, संस्कृति और परिस्थिति से अवगत हुए। बाद में मिशन कार्य करने के लिए उन्हें तोरपा एक उपयुक्त जगह लगी और वे वहाँ जाकर मुंडा आदिवासियों के बीच करीब ढाई साल रहे। यहीं से उनहोंने खीस्त के प्रेम और उस पर विश्वास करने की आग जलायी जो बाद में धीरे-धीरे पूरे छोटानागपुर में फैल गई। कई लोग उनके पास आये और अपने दुःख, दर्द और समस्याओं को उनके समक्ष रखे। फादर लीवन्स उन्हें बड़े ध्यान से सुना और अपने विश्वास और ज्ञान के आधार पर उनको सलाह और सुझाव दिये। उनकी सरल बातें और उनके साथ एक अनोखी आत्मीयता का भाव, उन लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। फादर कोन्सटन्ट लीवन्स हर तरह से हर संभव उनकी मदद की। यही वजह थी कि कई लोग स्वेच्छा से बपतिस्मा ग्रहण करने के लिए तैयार हुए और ईसाई धर्म को अपनाये। अपने अधिकारियों के निर्देश का पालन करते हुए 1888 को वे राँची आये और मनरेसा हाउस में रहकर अपने मिशन कार्य को जारी रखे। वे लोहरदगा मिशन के निदेशक बनाये गये और पाँच वर्षों तक इस जिम्मेदारी को उन्होंने बड़ी निपुणता के साथ निभाया। वे नियमित रूप से अपने मिशन क्षेत्रों का दौरा करते रहे। वे अपने सरल व्यवहार और मिलनसारी भाव के कारण लोगों के बीच लोकप्रिय हुए। उनकी बारवे यात्रा की शुरूआत बड़ी नाटकीय और दिलचस्प थी। 1889 ई. को नवाडीह के निकट बिरीं गाँव के कुछ लोग कोर्ट कचहरी के काम से राँची आये थे। कोर्ट परिसर में उनकी भेंट फादर कोन्सटन्ट लीवन्स से हुई। फादर कोन्सटन्ट लीवन्स अपने स्वभाव के अनुसार आत्मीय भाव से उनसे बातचीत की, उनके मुद्दों को अपने संज्ञान में लिया और उनका उचित मार्गदर्शन भी किया। इसका फल यह हुआ कि जो बहुत कठिन मामला था, वह आसानी से सुलझ गया और उन्हें आसानी से जीत मिली। अतः यह बिरी के लोगों को इतना अधिक प्रभावित किया कि वे उन्हें बारवे आने का निमंत्रण दिया। इस तरह उनका बारवे का दौरा हुआ। राँची से वे पाँच बार बारवे का यात्रा की पर इन्हीं यात्राओं से उन्होंने सम्पूर्ण बारवे को खीस्त के चरणों में ला दिया। उन्होंने एक अ‌द्भुत व्यवस्था बनाई जिससे लोग बपतिस्मा लेने के लिए तैयार हुए और हजारों की संख्या में विश्वासी खीस्तीय होते गये। यह मिशन आसान नहीं था, पर लोगों की मासूमियत और उत्सुकता, उसे हर चुनौती को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। कई बार उनका घोड़ा जिसका नाम जेनरल था अपनी बहादुरी से उनके विरोधियों और जंगली जानवरों से बचाया। उन्होंने आदिवासियों में दो बड़ी समस्यायें पाई। एक था अंधविश्वास जो बेवजह उन्हें डराती थी, और दूसरा जर्मीनदारों का जुल्म था। फादर लौवन्स ने येसु खीस्त को मुक्तिदाता के रूप में देकर उनके अंधविश्वास को दूर किया। कानूनी किताबों का ज्ञान देकर और लोगों के हक और अधिकार से उनको अवगत कराकर जर्मीनदारों के जुल्म से उन्हें मुक्त कराया। उन्होंने उन्हें आध्यात्मिक और शारीरिक उन्नति करने के उपाय बताये। ये दो मदद उन साधारण लोगों के लिए किसी दैवीय मदद से कम नहीं थी। अतः वे बड़ी तत्परता और उत्सुकता से बड़ी संख्या में बपतिस्मा ग्रहण किये और खीस्तीय बने। जरूर अन्य पुरोहितों का भी इसमें योगदान था पर जो माहौल फादर कॉन्सटन्ट लीवन्स ने अपने कठिन परिश्रम और अपने आराम और खुशियों का त्याग कर बनाया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। अत्याधिक यात्रा करने, शारीरिक थकावट और सही खान-पान के अभाव के कारण वे क्षय या टी.वी. रोग के शिकार हुए। इसके बावजूद वह काम करते रहे। उन्हें अपना स्वस्थ्य की परवाह नहीं रही। जब इलाज शुरू हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इलाज के लिए वे अपने देश बेल्जियम लौटे। पर वहाँ का बेहतर इलाज भी उनकी नहीं बचा पाया और 7 नवम्बर 1893 ई. को बेल्जियम के लूभेन में मात्र 37 साल की उम्र में उनका देहान्त हो गया। अपने अल्पकालिक जीवन्त व्यक्तित्व से मात्र सात-आठ साल में ही फादर लीवन्स ने पूरे छोटानागपुर का कायापलट कर दिया। छोटानागपुर में कई मिशनरी आये पर उनमें अगर कोई अधिक साहसी, उत्साही और प्रतिभावन थे तो वह फादर कॉन्सटन्ट लीवन्स ही थे। यही वजह है कि आज वे छोटानागपुर के प्रेरित कहलाते हैं। 'आग जलती रहे' फादर कॉन्सटन्ट लीवन्स का आदर्श वावक्य था। इसमें वे येसु खीस्त के प्रेम और खीस्तीय विश्वास में जलते रहने की बात कहे थे। फादर कॉन्सटन्ट लीवन्स और हमारे पुरखे जो उनके सहयोगी थे उनमें जो जोश, आपसी प्रेम, एकता और खीस्तयता को स्वीकार करने और जीने की जो जज्बा थी वह आज भी हमारे लिए एक मिसाल है। उन्होंने हमें विश्वास का अमूल्य दान दिया। आप माने या न मानें लेकिन इसी विश्वास के कारण आज हम लोगों के जीवन में, रहन-सहन और कई चीजों में बहुत बड़ा बदलाव आया है और हम एक सम्मानित जीवन जीने लायक बन पाये हैं। फादर कॉन्सटन्ट लीवन्स हमारे बीच एक सुसंगठित समाज की स्थापना करना चाहते थे जो उनका एक बड़ा सपना था। फादर कॉन्सटन्ट लीवन्स और अपने सहयोगियों से इसे पूरा करने का वे भरसक प्रयास किये। आज हमारे लिए उसी सपने को पूरा करना और उनके माध्यम से मिली ईश्वरीय महती दया, प्रेम और विश्वास को और अधिक जीवन्त एवं क्रियाशील बनाने की जम्मेदारी है। अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो यही हमारे द्वारा फादर कॉन्सटन्ट लीवन्स के लए सबसे बड़ा सम्मान और श्रद्धांजलि होगी। ऐसा करने में ईश्वर हमारी मदद करे और खीस्त की ज्योति हर घर-घर में जले और फैले और हम हर एक जन एक सम्मानित जीवन जी पायें।

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